स्वामिविवेकानन्दवचनाऽमृतम्

१.गर्व से कहो मैं भारतवासी हूँ और प्रत्येक भारतवासी मेरा भाई हैं।

गर्वेण वदेद् यदहमस्मि भारतवासी प्रत्येकं भारतवासिनश्च सन्ति मे भ्रातर:।
२.गुलाब जैसे अपने स्वभाव से ही सुगन्ध का वितरण करता है ,उसी प्रकार तुम भी दान दो।

पाटलं यथा स्वप्रकृत्यैव सौरभं वितरति तथा देहि त्वमपि दानम् ।

३.भारत देश दर्शन,धर्म,आचार-संहिता,मधुरता,कोमलता और प्रेम की मातृभूमि है।

दर्शनस्य धर्मस्य आचारसंहिताया: मधुरताया: कोमलताया: प्रेम्णश्चमातृभूमिरस्ति भारतदेश:।

४.बहुत तपस्या करने से ही मन पवित्र होता है।भगवान तो पवित्रतास्वरूप हैं और उन्हें बिना तपस्या के प्राप्त नहीं किया जा सकता है।

बहुतपसैव पवित्रम्भवति मन:। भगवान्तु पवित्रतास्वरूपोऽस्ति,तपसा विना तञ्च नावाप्तुं शक्यते।

५.केवल आध्यात्मिक ज्ञान ही ऐसा है, जो हमारे दु:खों को सदा के लिए नष्ट कर सकता है।

केवलमाध्यात्मिकं ज्ञानमेवैतादृशमस्ति ।यदस्माकं दु:खानि नश्यति सततम्।

६.क्षात्रभाव- वीरता और आत्मसंतुष्टि, प्रभुत्व में नहीं,आत्मत्याग में है।

क्षात्रभाव:/क्षत्रियभावो वीरता आत्मसन्तुष्टिश्च प्रभुत्वे नापितु आत्मोत्सर्जने भवन्ति।

७.जनसाधारण और स्त्रियों में शिक्षा का प्रसार किए बिना उन्नति का कोई उपाय नहीं।

जनसामान्येषु स्त्रीषु च शिक्षाप्रसारादृते उन्नते: कश्चिदुपायो नास्ति।

८.दुनियाँ एक बडी व्यायामशाला है , जहाँ हम अपने आपको बलवान् बनाने के लिए आते हैं।

जगदेका बृहती व्यायामशालाऽस्ति, यत्र वयं स्वयमात्मन: बलिन: कर्तुं याम:।

९.भारत में जिस एक चीज का हममें अभाव है वह है मेल तथा संगठन- शक्ति और उसे प्राप्त करने का प्रधान उपाय है आज्ञापालन।

भारते यस्यैकस्य पदार्थस्यास्मासु अभावोऽस्ति ,तच्च एकता उत  सङ्घटनशक्ति: ,तच्चावाप्तुं प्रधान उपायोऽस्त्याज्ञापालनम् ।

१०. महान विश्व -संगीत में तीन भावों का विशेष प्रकाश दिखाई देता है- साम्य,बल और स्वाधीनता।

महति विश्वसङ्गीते त्रयाणां भावानां विशेष: प्रकाशो दृश्यते-साम्यं बलं स्वाधीनता च।

११.सदा बड़बड़ाते रहने से तुम्हारा जीवन दु:खमय हो जाएगा और सर्वत्र असफलता ही हाथ लगेगी ।

सदा वावदनेन/जल्पनेन दु:खमयंं भविष्यति जीवनन्ते,असफलतैव चागमिष्यति हस्ते।

१२.मनुष्य के चरित्र का नियमन करने वाली दो चीजें होती है,बल और दया।

मानवचरित्रस्य नियमनकारणं पदार्थद्वयम्भवति बलं दया च।

१३.विवाह हो या ब्रह्मचर्य,पाप हो या पुण्य,ज्ञान हो या अज्ञान - इनमें से प्रत्येक की सार्थकता हो सकती है, यदि वह इस चरम लक्ष्य की और ले जाने में सहायता करें।

उपयमनम्भवतु उत ब्रह्मचर्यं, पापम्भवतु उत पुण्यम् ,ज्ञानम्भवतु उत अज्ञानम्।एतेषु प्रत्येकं सार्थकता भवितुं शक्नोति,यदि तदिमं चरमलक्ष्यं प्रति गमयितुं सहायं कुर्यात्।

१४. स्वतन्त्रता पुण्य है, पराधीनता पाप।
स्वतन्त्रा पुण्यमस्ति परं पराधीनता पापम्।
#संस्कृतभारती
#स्वच्छभाषाभियानम्
#सुरभारतीसमुपासका:
#दीपकवात्स्य:

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