"हृृृृत्स्पर्शिनी कथा"
"हृृृृत्स्पर्शिनी कथा"
🙏 एक: स्वर्णकार आसीत् ,तस्य आपणतो युक्त एक लोहकारस्यापण आसीत्।स्वर्णकारो यदा कार्यं करोति स्म तदा तस्यापणात् मन्दध्वनिर्नि:सरति स्म,परं यदा लोहकार: कार्यं करोति स्म तदा तस्यापणात् कर्णकटुध्वनि: श्रूयते स्म।
एकदा स्वर्णकणो विच्छिद्य लोहकारस्यापणे समापतित:।तत्र तस्य मेलनं लोहस्य एकेन कणेन साकं जातम्।
स्वर्णकणेन लोहकणः पृष्टो - भ्रात:! आवयोर्दु:खं समानमस्ति ,आवामेव समाने अग्नौ तप्यावहे, आवाभ्यां समानरूपेण मुद्गरप्रहार: सोढव्यो भवति।अहमेता यातना: तुष्णीभूय सहे परं त्वं बहुशब्दं करोषि,किमर्थम् ?
लोहकणो द्रवितमनसा अकथयद् यत् तव कथनं सत्यम्?परं त्वयि प्रहारको मुद्गरस्तव सहोदरो(सप्रकृतिक:/सजातीय:) नास्ति।मयि प्रहारको लोहमुद्गरो मम सहोदरो(सप्रकृतिक:/सजातीय:)वर्तते।
परेषामपेक्षया स्वजनैर्दीयमान: प्रहार: अधिकां पीडां प्रयच्छति जनयतीत्यर्थ:।
#स्वच्छभाषाभियानम्
#सुरभारतीसमुपासका:
#संस्कृतभारती
#दीपकवात्स्य:
"एक सुनार था, उसकी दुकान से मिली हुई एक लोहार की दुकान थी।
सुनार जब काम करता तो उसकी दुकान से बहुत धीमी आवाज़ आती, किन्तु जब लोहार काम करता तो उसकी दुकान से कानों को फाड़ देने वाली आवाज़ सुनाई देती।
एक दिन एक सोने का कण छिटक कर लोहार की दुकान में आ गिरा।वहाँ उसकी भेंट लोहार के एक कण के साथ हुई।
सोने के कण ने लोहे के कण से पूछा- भाई हम दोनों का दुख एक समान है, हम दोनों को ही एक समान आग में तपाया जाता है और समान रूप ये हथौड़े की चोट सहनी पड़ती है।
मैं ये सब यातना चुपचाप सहता हूँ, पर तुम बहुत चिल्लाते हो, क्यों?
लोहे के कण ने मन भारी करते हुऐ कहा-
तुम्हारा कहना सही है, किन्तु तुम पर चोट करने वाला हथौड़ा तुम्हारा सगा भाई नहीं है।
मुझ पर चोट करने वाला लोहे का हथौड़ा मेरा सगा भाई है।
परायों की अपेक्षा अपनों द्वारा दी गई चोट अधिक पीड़ा पहुचाँती है"।
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