अलङ्कारलक्षणावलिः-दीपकवात्स्यः
"अलङ्कारलक्षणावलिः-दीपकवात्स्यः"
आपाततो यदर्थस्य पौनरुक्त्येन भासनम्।
पुनरुक्तवदाभासः स भिन्नाकारशब्दगः।। साद-१०.२।। सत्यर्थे पृथागर्थायाः स्वरव्यञ्जनसंहतेः।
क्रमेण तेनैवावृत्तिर्यमकं विनिगद्यते।।
अनुप्रासः शब्दसाम्यं वैषम्ये ऽपि स्वरस्य यत्।
स्वरमात्रसादृश्यं तु वैचित्र्याभावान्न गणितम्।
रसाद्यनुगतत्वेन प्रकर्षेण न्यासोऽनुप्रासः।
छेको व्यञ्जनसङ्घस्य सकृत्साम्यमनेकधा।।साद-१०.३।। साद-१०.८ ।।
अन्यस्यान्यार्थकं वाक्यमन्यथा योजयेद्यदि।
अन्यः श्लेषेण काक्वा वा सा वक्रोक्तिस्ततो द्विधा।।साद-१०.९ ।।
श्लिष्टैः पदैरनैकार्थाभिधाने श्लेष इष्यते।
वर्णप्रत्ययलिङ्गानां प्रकृत्योः पदयोरपि ।। साद-१०.११ ।।
श्लेषाद्विभक्तिवचनभाषाणामष्टधा च सः।
द्विधेति श्लेषवक्रोक्तिः काकुवक्रोक्तिश्च।। साम्यं वाच्यमवैधर्म्यं वाक्यैक्य उपमा द्वयोः।। साद-१०.१४ साधर्म्यमुपमाभेदे-काव्यप्रकाशः।
श्रौती यथेववाशब्दा इवार्थो वा वतिर्यदि।
आर्थी तुल्यसमानाद्यास्तुल्यार्थो तत्र वा वतिः।। साद-१०.१६ ।।.उपमा -
उपमान और उपमेय के समान धर्म से सादृश्य ही उपमा है।
लक्षण - “साधर्म्यमुपमा भेदे”
अर्थात् उपमान और उपमेय में भेद होने पर भी समानता का (साधर्म्य का) वर्णन ही उपमा है।
2.यमक -
जहाँ समान रूप से दिखाई देने वाले दो शब्द अर्थ की दृष्टि से भिन्न होते है, वहाँ यमक अलंकार होता है।
लक्षण -
“सत्यर्थे पृथगर्थायाः स्वरव्यञ्जन संहतेः।
क्रमेण तेनैवावृत्तिर्यमकं विनिगद्यते।।”
अर्थात् जहाँ अर्थयुक्त भिन्न-भिन्न अर्थों के शब्दों की पूर्वक्रम से आवृत्ति होती है, वहाँ यमक अलंकार होता है।
यहाँ एक वर्णसमूह का अर्थ दूसरे वर्णसमूह से अलग होगा।
3.उत्प्रेक्षा -
जहाँ उपमेय की उपमान के साथ सम्भावना की जाती है, वह ही उत्प्रेक्षा है।
लक्षण - “सम्भावनमथोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य समेन यत्।”
अर्थात् प्रकृतस्य - वर्ण्य की (उपमेय की) उपमान के साथ जो सम्भावना (एककोटिक सन्देह की उत्पत्ति) की जाती है, वह ही उत्प्रेक्षा है।
रूपक अलंकार -
रूपकं रूपितारोपाद् विषये निरपह्नवे। तत्परम्परितं साङ्गं निरङ्गमिति त्रिधा।।साहित्यदर्पणे दशमपरिच्छेदे
( जहाँ निषेध रहित उपमेय पर उपमान के अभेदारोप का वर्णन हो)
सन्देह अलंकार
सन्देहः प्रकृतेऽन्यस्य संशयः प्रतिभोत्थितः।(विश्वनाथः)
(उपमेय में उपमान के संशय को सन्देहालंकार कहते हैं)
भ्रान्तिमान अलंकार
साम्यादतस्मिंस्तद्बुद्धिर्भ्रान्तिमान् प्रतिभोत्थितः ।
( एक वस्तु में दुसरी वस्तु का अनुभव/निश्चयात्मक ज्ञान होना)
उल्लेख अलंकार -
क्वचिद् भेदाद् ग्रहीतृृणां विषयाणां तथा क्वचित्।
एकस्यानेकधोल्लेखो यः स उल्लेख उच्यते।।
( जहाँ एक वस्तु का अनेक प्रकार से वर्णन हो)
अपह्नुति अलंकार
प्रकृतं प्रतिषिध्यान्यस्थापनं स्याद्पह्नुतिः ।
( जहाँ उपमेय का प्रतिषेध करके उपमान की स्थापना की जाए)
निश्चय अलंकार
अन्यन्निषिध्य प्रकृतस्थापनं निश्चयः पुनः ।
( जहाँ उपमान का प्रतिषेध करके उपमेय की स्थापना की जाए)
उत्प्रेक्षा अलंकार
भवेत्संभावनोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य परात्मना ।
( जहाँ प्रकृत की अप्रकृत के रूप में सम्भावना हो)
सम्भावनमथोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य समेन यत्-काव्यप्रकाशः
उत्प्रेक्षा के भेद = 2
1 वाच्योत्प्रेक्षा
2 प्रतीयमानोत्प्रेक्षा
वाच्येवादिप्रयोगे स्यादप्रयोगे परा पुनः।
अतिशयोक्ति अलंकार
सिद्धत्वेऽध्यवसायस्य अतिशयोक्तिः निगद्यते ।
( अध्यवसाय के सिद्ध होने पर अतिशयोक्ति अलंकार)
अतिशयोक्ति 5 प्रकार की होती है।
अर्थान्तरन्यास अलंकार
सामान्यं वा विशेषो वा तदन्येन समर्थ्यते।
यत्तु सोऽर्थान्तरन्यासः साधर्म्येणेतरेण वा।।
( सामान्य का विशेष से अथवा विशेष का सामान्य से समर्थन होने पर अर्थान्तरन्यास कहलाता है।)
दीपक अलंकार
अप्रस्तुत प्रस्तुतयोर्दीपकं तु निगद्यते।
अथ कारकमेकं स्यादनेकासु क्रियासु चेत् ।।
( प्रस्तुत और अप्रस्तुत पदार्थों में एक धर्म सम्बन्ध ही दीपक अलंकार होता है।)
दृष्टान्त अलंकार -
दृष्टान्तस्तु सधर्मस्य वस्तुनः प्रतिबिम्बनम्।
( दो वाक्यों में समान धर्म से युक्त उपमान उपमेय के बिम्ब प्रतिबिम्बन को दृष्टांत अलंकार कहते है।)
निदर्शना अलंकार -
अभवन् वस्तुसम्बन्धः उपमापरिकल्पकः ।
( जहाँ वस्तु का असम्भव सम्बन्ध उपमा का परिकल्पक होता है)
व्यतिरेक अलंकार
आधिक्यम् उपमेयस्य उपमानान्न्यूनता।
( जहाँ उपमेय की उपमान से अधिकता व न्यूनता का वर्णन हो)
विभावना अलंकार
विभावना विना हेतुं कार्योत्त्पतिर्यदुच्यते।
( जहाँ बिना हेतु के कार्य की उत्पत्ति का वर्णन हो)
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